सोमवार, 26 दिसंबर 2011

आधी तुम्हारी आधी हमारी

पुरूष पक्ष
आधी तुम्हारी आधी हमारी
-राज वाल्मीकि
राष्ट्रीय सहारा का  साप्ताहिक परिशिष्ट ‘आधी दुनिया’ महिलाओं का पक्ष प्रस्तुत करता है। इसमें मनीषा जी का ‘खरी-खरी’ रेगुलर कॉलम है। मुझे लगता है जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह स्त्री-पुरूष भी पूरी दुनिया के दो पहलू हैं। और ये एक दूसरे के पूरक भी हैं। आज के समय में जब हम मानव अधिकारों की बात करते हैं तो स्त्री-पुरूष के समान अधिकारों की भी बात करते हैं। प्रायः देखा गया है कि आधी दुनिया में दिए गये लेखों का निष्कर्ष यही होता है कि पुरूष स्त्रियों पर अत्याचार करते हैं। उनका यौन शोषण करते रहते हैं। लेकिन स्त्रियों को ऐसे पेश किया जाता है जैसे वे बहुत निरीह होती हैं। मासूम होती हैं। पुरूष उस पर अत्याचार करता रहता है। मनीषा जी को अक्सर यह शिकायत रहती है कि पुरूष बहुत घाघ टाइप के होते हैं। वे स्त्रियों को भोगने के लिए उन्हें फंसाते  रहते हैं। इसके लिए वे उदाहरण भी देती हैं। और अपने विचारों की पुष्टि के लिए प्रमाण भी देती हैं। जो पहलू वह देखती हैं वह सच होता है। पर जब मैं दुनिया के बारे में सोचता हूं तो अंधों और हाथी वाली कहावत याद आती है। जिसमें जो अंधा व्यक्ति हाथी के जिस अंग को पकड़ कर महसूस करता है वह हाथी का आकार उसी प्रकार का बताता है। पर आप और हम जानते हैं कि वे अपनी जगह सही होते हैं पर असल में हाथी का आकार वह नहीं होता जो वे बताते हैं। उनकी सीमा यह है कि जितना वे पकड़ कर महसूस करते हैं उसी के आधार पर बताते हैं। उसी तरह हम और आप जितनी दुनिया देखते हैं या अनुभव करते हैं उसी के आधार पर अपने विचार बनाते हैं। पूरी दुनिया के बारे में मुझे नहीं मालूम - पर अपने देश में प्रायः यह मान लिया जाता है कि यहां पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था है, और एक हद तक सच भी है। इस कारण यहां स़्ित्रयों के साथ भेदभाव किया जाता है। मनीषा जी का उद्देश्य भी यही रहता है कि लैंगिक भेदभाव समाप्त कर लैंगिक समानता स्थापित हो। इस में कोई दो राय नहीं कि वे अपनी जगह सही होती हैं। स्त्री पुरूष में समानता होनी चाहिए। दोनों के अस्तित्व के बिना यह दुनिया संभव नहीं है। उनमें स्वामी और गुलाम का रिश्ता कदापि नहीं होना चाहिए। साथी का रिश्ता होना चाहिए। बराबरी का रिश्ता होना चाहिए।
पर हम यथार्थ में देखते हैं तो आधी दुनिया परिशष्ट आधी दुनिया का आधा सच दिखाता है। पत्नी रूप में स्त्री दासी होती है,  गुलाम होती है, निरीह होती है, इस बारे में मेरा मानना है कि यह पूरा सच नहीं हैैं। मेरे पुरूष होने के कारण स्त्रियां भले इसे पुरूषवादी नजरिया कहें। पर पूरा सच सामने आना चाहिए। मैं पुरूष हूं। हम पुरूषों की भी आधी दुनिया है। जो स्त्रियों के साथ ही बीतती है। स्त्रियां चाहे मां के रूप में हों, बहन के रूप में हों या पत्नी के रूप में हों। अतः पुरूष पक्ष को इग्नोर नहीं किया जाना चाहिए।
हमारा समाज आर्थिक आधार पर कई वर्गों में बंटा हुआ है। हर वर्ग के बारे में मैं जानता हूं -ऐसा दावा नहीं कर सकता। मैं आर्थिक रूप से निम्न वर्ग से संबंधित हूं। इसलिए अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि यहां पत्नी के रूप में स्त्री मेहनत-मजदूरी करके कमाती है। पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। घर के हर फैसले में बराबर का हक रखती है। प्यार और तकरार में पुरूष से जरा भी उन्नीस नहीं है। कई बार तो घर के किसी मामलें में  पुरूष उसकी जायज और नाजायत मांग मे अपनी सहमति की मुहर इसलिए लगा देते हैं कि घर में महाभारत न हो। पुरूषों को उंगलियों पर नजाने वाली महिलाएं भी होती हैं। कहीं पुंरूषों का अहं या हठ है तो स्त्रियों का त्रिया हठ भी कम नहीं होता। महिलाओं की वजह से रामायण और महाभारत हो जाते हैं। मर्डर हो जाते हैं। इस समाज में कहीं पुरूष स्त्री का स्वामी है तो कहीं जोरू का गुलाम भी है। आज का सच यह भी है कि जिस तरह पति पीड़ित पत्नियां होती हैं उसी तरह पत्नी पीड़ित पति भी होते हैं। जहां तक अवैध  शारीरिक संबंधों की बात है तो आमतौर पर स्त्री हो या पुरूष सामाजिक मान्यताओं के भय से सभी बचते हैं। और जहां अवैध संबंध होेने की बात है तो सच यह भी है कि प्रकृति ने स्त्रियों और पुरूषों को यौनेच्छा दी है, कहीं पुरूष अवैध यौन संबंध बनाते हैं तो कहीं स्त्रियां भी पहल करती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्री-पुरूष दोनों के समान अधिकार हैं। दोनों को अपने हक लेेने चाहिए। मुझे लगता है कि हमारे देश में शिक्षित लोगों का प्रतिशत शत प्रतिशत होना चाहिए। सभी शिक्षित हों अपने और दूसरेां के अधिकारों के प्रति जागरूक हों। आज की जो शिक्षित और जागरूक स्त्रियां हैं मेरे अनुभव के अनुसार तो यही है कि कोई पुरूष बहला-फुसला कर उनसे शारीरिक संबंध नहीं बना सकता जब तक कि वे खुद न चाहें। और उनकी मरजी होती है तो एक से अधिक पुरूषों से भी इस तरह के संबंध रखती हैं। ऐसी भी स्त्रियां हमारे समाज में ही हैं। स्त्रियों के लिए ट्रेन-बसों में आरक्षित सीटें होती हैं। अस्पतालों आदि में अलग लाईने होती हैं। लड़कियों के लिए दिल्ली में  लाडली योजना है। दिल्ली मेट्रों में तो पूरा एक कंपार्टमेंट ही उनके लिए होता है। बावजूद इसके दिल्ली शहर महिलाओं के लिए सर्वाधिक असुरक्षित समझा जाता है। सरकार का  महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भी है। इसमें भी कोई दो राय नहीं की प्रतिभा के मामले में स्त्रियां पुरूषों से कहीं कम नहीं होतीं। आज हम स्त्रियों को बड़े-बड़े पदों पर आसीन देखते हैं। देश की राष्ट्रपति महिला हैं। प्रधानमंत्री भी रह चुकी हैं। मुख्यमंत्री महिलाएं हैं। क्या ये सच नहीं है? जहां तक पुरूषों के चतुर-चालाक होेने की बात है तो महिलाएं भी कम चतुर-चालाक नहीं होतीं। आर्थिक समृद्धि एवं पावर की बात लें तो आर्थिक रूप से समृद्ध महिलाओ ंके यहां पुरूषों को पानी भरते देख सकते हैं। रामू टाईप के घरेलू नौकर-ड्राईवर उनकी जीहुजूरी में लगे रहते हैं। क्या ये सच नहीं है? इसी प्रकार बड़े पदों पर आसीन महिलाएं पुरूषों को अपने इशारों पे नचाती हैं। फर्ज कीजिए कि किसी ऑफिस की बॉस महिला है। और वहां पुरूष चपरासी है तो क्या वह उसके हुक्म की उदूली नहीं करेगा? किरन वेदी जैसी प्रशासनिक अधिकारी पुलिस इंस्पेक्टर को थप्पड़ नहीं मार देतीं? ऐसी स्थिति में सिर्फ पुरूषों में ही कमियां ढूढना क्या न्यायोचित है?
मेरा मानना है कि महिलाओं पर अत्याचार, शोषण और भेदभाव होते हैं - उसके लिए उनका स्त्री होना ही कारण नहीं है। कारण इससे इतर भी हैं। हमारे देश में जातिवादी व्यवस्था होने के कारण महिला पर अत्याचार की वजह उसका दलित/आदिवासी/वंचित तबके से होना होता है। अमीरी-गरीबी की दृष्टि  से देखें तो महिलाओं के शोषण का कारण उनका गरीब होना होता है। शिक्षा के नजरिये से देखा जाए तो उनका अशिक्षित/अनपढ़ अज्ञानी होना होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि महिलाओं पर अत्याचार/शोषण/भेदभाव के कई कारण हो सकते हैं।
मुझे लगता है कि महिला सशक्तिीकरण के इस दौर में महिलाओं का उच्च शिक्षित होना परमावश्यक है। अतः हमें अपनी बहन-बेटियों को ऊंची से ऊंची शिक्षा प्रदान करवानी चाहिए। यदि महिलाएं उच्च शिक्षित होंगी। और  अच्छा रोजगार या व्यवसाय करेंगी। आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होंगीं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगी तो जाहिर है कोई उन पर अत्याचार नहीं कर पाएगा। उनके साथ भेदभाव नहीं होगा। उनका शोषण नही ंकिया जा सकेगा। तब कोई पुरूष उनका स्वामी न होगा। वे किसी की दासी न होंगीं। उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। असल में प्रकृति ने तो स्त्री पुरूष को एक दूसरे का पूरक ही बनाया है। छोटा या बड़ा नहीं। प्रकृति ने पुरूष को एक्टिव पार्टनर बनाया है। इसलिए स्त्री पुरूष की एक बड़ी कमजोरी की तरह होती है। नारीवादी लेखिकाओं से अनुरोध करना जरूरी लगता है कि कृप्या पुरूषों को स्त्रियों के दुश्मन की  तरह पेश न करें। क्योंकि उनके भी पिता-भाई-पति आदि पुरूष ही होते हैं। वे भी आपकी तरह ही इन्सान होते हैं। गलत यदि कहीं भी होता है तो निश्चित रूप से उसका विरोध किया जाना  चाहिए। पर अतिशोक्तिपूर्ण ढंग से किसी पर (स्त्री या पुरूष पर) बेवजह या बेबुनियाद आरोप या पूर्वाग्रहवश आक्षेप नहीं लगाए जाने चाहिए। इसमें दो राय नहीं है कि आखिर स्त्री और पुरूष ही तो हैं जिनसे यह दुनिया पूरी होती है। किसी एक की अनुपस्थिति में यह आधी दुुनिया हो जाती है। तो क्यों न हम मिलकर कहें कि आधी तुम्हारी आधी हमारी। आओ मिलकर कहें कि हम से ही है ये दुनिया सारी।
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औरत भए न मर्द


औरत भए न मर्द
-राज वाल्मीकि
‘मुन्नी बदनाम हुुई...’ गीत की धुन पर कुछ किन्नर मित्र के घर के बाहर थिरक रहे थे। उनके यहां पहला पोता हुआ था। इसी उपलक्ष्य में मित्र ने भोज पर मित्र मण्डली को आमंत्रित किया था। मैं निर्धारित समय पर उनके घर पहुंच गया। जैसा कि हमारे यहां आमतौर पर होता है कोई समय पर पहुचना पसन्द नहीं करता। कुछ इस तरह की धारणा है कि  जो समय पर पहुंचता है वह आम और देर से पहुंचने वाले को खास समझा जाता है। हमारे यहां समय के पाबंद या पंक्चुअल व्यक्ति को भोला या मूर्ख समझा जाता है भले ही लोग उसके मुंह पर उसकी तारीफ करें। आयोजक भी निमंत्रण पत्र में  अपने आयोजन के शुरू होने के वास्तविक समय से एकाध घंटे पहले का समय ही छपवाते हैं। लोग देर से ही पहंुचेंगे यह अन्डरस्टूड होता है।खैर। मित्र के घर पहुंचकर मैंने देखा कि वे कार्यक्रम के आयोजन में व्यस्त थे। मुझे उन्होने ड्रांईग रूम में बैठने को कहा। वहां अकेले बैठना मुझे असहज लगा। बााहर किन्नरों के नाचने-गाने की आवाजे ंआ रहीं थीं। सोचा, क्यों न चलकर किन्नरों की जिन्दगी में झांका जाए। अतः मैं उनसे बावस्ता हुआ। शुरू में तो उन्होने उपेक्षा भाव दिखाया। पर जब मैंने उनसे आत्मीयता से बात की तो थोड़े सहज हुए। उनसे पता चला कि वे लड़का पैदा होेने पर ज्यादा रकम वसूलते है - लड़की होने पर कम। स्पष्ट था कि वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अभ्यस्त थे।
किन्नरों से बात करते समय मुझे अपने  बचपन में पढ़ी एक कवि (शायद द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) की कविता की कुछ पंक्तियां अनायास याद आ गईं - ‘यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता, सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।’लेकिन आज जब किन्नरों के बारे में सोच रहा हूं तो लगता है कि यह किसी बच्चे का यूटोपिया है या कवि की कल्पना। क्योंकि किन्नरों के राजा होने की आज तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।  हमारे सामाजिक ढांचे में किन्नर समुदाय के प्रति कोई आदर भाव नहीं है। हिन्दी बेल्ट में आम बोलचाल की भाषा में उनके लिए ‘हिजड़ा’ कह कर संबोधित किया जाता है। यदि कोई मर्द के लिए इस  शब्द का प्रयोग करता है तो यह उसके लिए सबसे बड़ी गाली होती है। नाना पाटेकर का किसी फिल्म में बोला गया डायलोग बहुत लोकप्रिय हुआ था - ‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है।’ इस वाक्य में समाज की किन्नर समुदाय के प्रति मानसिकता झलकती है। किन्नरों के साथ इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे कि वे इन्सान ही न हों। किन्नरों ने मुझ से कहा कि ‘बाबूजी आपने हमे किन्नर कह कर पुकारा है नहीं तो लोग हमें हिजड़ा कहते हैं। हमें यह शब्द गाली की तरह लगता है। समाज हमारा अपमान करता है। हमारा मजाक बनाता है। पर हमारे दर्द को नहीं समझता। आप ही बताईए क्या हम इन्सान नहीं हैं?...’ उस किन्नर के ये शब्द मन को छू गये। मैं सोचने लगा कि जिस तरह हमारे यहां समाज व्यवस्था है उसमें आम इन्सान को भी कहां इन्सान समझा जाता है। जानवरों को पूजा जाता है पर उसे कीड़ों-मकोड़ों से भी बदतर स्थिति में रखा जाता है। दलितों को सदियों से ऐसा गुलाम समझा गया जिसका महत्व जानवरों जितना भी नहीं है। उसे अस्पृश्य माना गया। आज भी हमारे देश में मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा प्रचलित है। क्या विडम्बना है कि एक इन्सान दूसरे का मल भी अपने हाथों से साफ करे और उसे ही अछूत समझा जाए! सीवर साफ करने वालों को क्या इन्सान समझा जाता है। अगर उन्हें इन्सान समझा जाता तो उनकी जिन्दगी इतनी सस्ती नहीं होती। सीवर की जहरीली गैस से सीवरकर्मियों की मौत की खबरें हम अखबारों में आए दिन पढ़ते रहते हैं। क्या एक ताकतवर इन्सान कमजोर को इन्सान समझता है। पूंजीपतियों के लिए महल बनाने वाले, कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर उन्हें अमीर बनाने वाले, उनकी नजरों में कीड़े-मकोड़ों से भी गए-गुजरे होते हैं। उन्हें इन्सान कहां समझा जाता है। ऐसे में किन्नरों केे बारे में समाज का जो नजरिया है वह बेहद असंवेदनशील है। किन्नर  अपनी व्यथा बताये जा रहे थे। ‘एक तो भगवान ने ही हमें न जाने किस अपराध की सजा दी जो न औरत बनाया न मर्द। दूसरे समाज हमें हिकारत से देखता है। हमारा शोषण करता है। पुलिस, दबंग और रईसजादों के लड़के हमारा शारीरिक शोषण भी करते हैं। समाज में जाने पर बच्चे, जवान और बूढ़े सभी यह कहते हैं कि हिजड़ा आ गया। जैसे कोई इन्सान नहीं कोई अजूबा आ गया हो। तब हम पर क्या बीतती है, हम ही जानते हैं। हमें लोग मनोरंजन का साधन तो समझते हैं लेकिन इन्सान नहीं। हम भी इन्सान हैं। हमारा भी मान-सम्मान है। आखिर समाज हमें कब इन्सान समझेगा? कब बदलेगी हमारे प्रति समाज की सोच...?’ किन्नर अपनी बातें कहे जा रहे थे और मेरे जहन में कभी जोकर तो कभी यौनकर्मियों की तस्वीरें किन्नरों के साथ गड्डमड्ड हो रहीं थीं। तभी मित्र ने आवाज दी  मैं यन्त्रवत्-सा उठकर चल दिया। सच कहूं तो मेरे पास भी उनके सवालों के जवाब नहीं थे। मेरे मन में भी प्रश्न उठ रहे थे। किन्नर समुदाय हमारे समाज का ऐसा हिस्सा हैं जो न औरत हैं न मर्द। पर हमारा समाज कब बदलेगा उनके प्रति अपना नजरिया, कब समझेगा उनका दर्द?
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किन्नर समाज का दर्द

हाशिए से
किन्नर समाज का दर्द
-राज वाल्मीकि
रानी महन्त (किन्नर) कहती हैं कि - ‘ मैंने बहुत से किन्नर इकट्ठे किए और रामलीला मैदान जाकर अन्ना हजारे का समर्थन किया। अन्ना हजारे को देखकर लगता है कि कोई तो है जो अपने बारे में न सोचकर जनता के बारे में सोचता है। उसकी भलाई के लिए अन्शन रखता है। जब वह हमारी भलाई के लिए, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए इतना कर रहे हैं तो हमें भी उनका साथ देना चाहिए।’ वे कहती हैं कि हम किन्नरों में बहुत इंसानियत होती है। अधिकांश औरतों-मर्दों को देखकर हैरानी होती है कि वे अपने स्वार्थ में ही लिप्त रहते हैं। दूसरों का दुख नहीं बांटते। वे अपने बारे में बताती हैं कि ‘कई बार मैंने बेसहारों को सहारा दिया है। सड़क पर घायल पड़े लोगों को अस्पताल पहुंचाया है। अपनी जेब से डॉक्टरों की फीस भरी है। पर यह देखकर दुख होता है कि समाज हमें ऐसी नजरों से देखता है  जैसे हम किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों। लोगों की नजरों में हमारे प्रति उपहास होता है। वे हमें हिकारत से देखते हैं। हमें मनोरंजन की वस्तु समझते हैं।’ रानी आगे कहती हैं कि ‘आप मेरी इस बात पर यकीन न करें तो बस्ती में जाकर पूछ लीजिए। मैं  दुख-सुख में सबके काम आती हूं। मेरे मन में जनहित की भावना है।’ ये पूछे जाने पर कि ‘यदि आपको टिकट मिल जाए तो आप  निगम पार्षद का चुनाव लड़ना चाहेंगी?’ वे कहती हैं ‘जरूर’। और अगर बस्ती वालों ने मुझे जिता दिया तो मैं इस बस्ती का कायाकल्प कर दूंगी। झुग्गियां नहीं तोड़ने दूंगी। इन्हें अधिकृत कराउंगी। अपना कर्तव्य  ईमानदारी से निभाउंगी। वैसे भी समाज सेवा करती रहती हूं। मैंने एड्स के प्रति जागरूकता के लिए
आवाज उठाई है। मैं चाहती हूं कि  किन्नरों का भी इलेक्शन में कोटा होना चाहिए। हम किन्नर जबान के पक्केे होते हैं। सबसे पहले तो मैं यहां स्कूल खुलवाउंगीं। क्योंकि इस बस्ती में एक भी स्कूल नहीं है। दूसरी महिलाओं के लिए डिस्पेंसरी, छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी। कच्ची गलियों को पक्का करवाउंगी।’ मेरे यह पूछने पर कि क्या बच्चों की बधाई मांगने से आपका गुजारा हो जाता है? वे कहती हैं कि हमारे इलाके बंटे होते हैं।
रानी महन्त   जैसे एक थाने के अन्तर्गत जितना क्षेत्र होता है वह उस क्षेत्र विशेष में रहने वाले किन्नर समुदाय का होता है। उस क्षेत्र में बच्चों की बधाई के अलावा शादी-विवाह में भी हम अपना हक लेते हैं। इस से गुजारा हो जाता है। पर हमारे लिए पेट भरना ही काफी नहीं है। पेट तो जानवर भी भर लेतेे हैं। हम चाहते हैं कि हम भी इन्सान हैं। हमारी भी इज्जत है। लोग हमारे प्रति अपनी सोच बदलें। हमें इन्सान समझें। हमारा मजाक न उड़ाएं। किन्नर समुदाय के बारे में पूछने पर उन्होेंने बताया कि हमारा समाज चार भागों में बंटा होता है। ये हैं - 1.राय वाले 2.सुजानी 3.मण्डी वाले और 4. लश्करिया। उनसे यह पूछने पर कि कुछ किन्नर सड़कों पर या बसों में भी पैसा मांगते हैं। इसके बारे में आपका क्या कहना है? इस पर वे कहती हैं  कि असल में वे किन्नर नहीं हैं। किन्नर कभी इस तरह सड़कों और बसों में पैसे नहीं मांगते। हमारे भी गुरू होते हैं और वे कभी इस तरह पैसा कमाने का आदेश नहीं देते।’


 
अम्बालिका
 उनके पास एक सतरह-अठारह साल की किन्नर बैठी हुई थी। मैंने उसके बारे में पूछा  तो उन्होने बताया कि इसका नाम अम्बालिका सिंह राठौर है। ये लखनऊ की है। तीन साल की उम्र में मुझे ये लखनऊ रेलवे स्टेशन पर चाय वाले की दुकान के पास लावारिश मिली। मैं इसे अपने साथ दिल्ली ले आई। मैंने ही इसकी तब से परवरिश की है। आप चाहें तो इससे भी पूछ सकते हैं। मैंने उसे अपने बारे मे बताने को कहा तो वह बोली-‘ मैं अठारह साल की हूं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में बी.ए.सेकेण्ड ईअर की छात्रा हूं। रानी जी ने मुझे बचपन से पाला-पोष कर बड़ा किया है। पढ़ाया-लिखाया है। ये ही मेरी माता-पिता हैं। मैं इन्हीं के साथ यहां ब्छ.115 टाली वाली बस्ती, गली नं.10 , आनन्द पर्वत में रहती हूं। किन्नर समाज में मुश्किल से 10 प्रतिशत लोग पढ़े लिखे हैं। मैं अपनी गुरू रानी जी की आभारी हूं कि वे मुझे उच्च शिक्षा दिला रही हैं।’ ये पूछने पर कि पढ़ाई के दौरान कोई परेशानी होती है? तो अम्बालिका बताती है कि लड़के हमें छेड़ते हैं। ‘हिजड़ा’ कहकर हमारा मजाक बनाते हैं। तब मैं सोचती हूं कि जब ये पढ़े-लिखेे, शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग हमारा मजाक उड़ा रहे हैं तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जाए। कब बदलेंगे ये लोग हमारे प्रति अपनी सोच। उससे यह पूछने पर कि क्या आप सरकार से कुछ अपेक्षा रखती हैं तो वह कहती है ‘हम भी इस देश के नागरिक हैं। सरकार जिस प्रकार की सुविधाएं विक्लांग लोगों को देती है वैसी ही हमें दे। नौकरियों मे किन्नरों का अलग आरक्षित कोटा होना चाहिए। एजूकेशन मे फीस कम होनी चाहिए। एडमिशन में ैब्ध्ैज्ध्व्ठब् की तरह सुविधाएं मिलनी चाहिए। अम्बालिका से ये पूछने पर कि क्या आप चाहती हैं कि आपकी शादी हो? वह कुछ शरमाते हुए कहती है कि उसे अच्छा लगेगा कि कोई मर्द उससे शादी करे। एक बच्चा गोद लेलें और हम पति-पत्नी की तरह एक अच्छी जिन्दगी जिएं।’ यह कहती हुई वह चाय बनाने चली जाती है।
हम रानी जी से मुखातिब हुए। आप किन्नर समाज के बारे में कुछ और बताईए। इस पर वे कहती हैं कि किन्नर समाज परम्पराप्रिय है। इसलिए अभी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। शिक्षा का अभाव है। किन्नरों को पॉश कॉलोनियों से अच्छा पैसा मिल जाता है। गुरू के रूप में मैं कहती हूं कि किसी गरीब को ज्यादा न सताएं। उनके आगे नंगे न हों। मेरी गुरू पुष्पा है जो 108 साल की हैं। हम लोग गुरू का बहुत आदर करती हैं। गुरू की आज्ञाकारी होती हैं। उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं  करतीं। हमारे डेरा होते हैं। जहां किसी भी जगह का किन्नर आकर रूक सकता है -अपने घर की तरह। मेरी एक किन्नर सहेली तमन्ना है जो लक्ष्मीनगर में रहती है। वह चांदनी हाजी की चेली है। मेरे यह पूछने पर कि  सरकार आपको कोई सुविधा देती है? या सरकार से आप कोई अपेक्षा रखती हैं? तो वे कहती हैं कि सरकार हमें कोई सुविधा नहीं देती है। मैं चाहती हूं कि जिस तरह रेलगाड़ी में महिलाओं के लिए कोच होते हैं उसी तरह किन्नरों का भी एक डिब्बा हो। इन्दिरा आवास की तरह हम लोगों को भी आवास की सुविधा मिले। किन्नरों को वृद्धावस्था पेंशन मिले।...’ उनकी बातों को सुनकर उनकी मांगे जायज लगती हैं। पर क्या सरकार इन पर तभी ध्यान देगी जब इनके लिए कोई अन्ना हजारे आन्दोलन करेगा?
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रविवार, 25 दिसंबर 2011

जीवन की आपा-धापी में

राज वाल्मीकि
मो. 9818482899

जीवन की आपा-धापी में

        ‘‘ और सुनाइए क्या हाल-चाल हैं?’’ बहुत दिन बाद मिलने पर मैंने अपने परिचित
        सुखीराम जी से यूं ही औपचारिकतावश पूछ लिया था तो लगा कि उनकी दुखती
        रग पर हाथ रख दिया हो। सुखीराम जी चालीस वर्षीय नौकरी-पेशा निम्न मध्यम
        वर्गीय सज्जन हैं। वे मेरे आगे फूट पड़े-‘‘ बस कुछ पूछिये मत राज साहब, कुछ ज्यादा
       पाने की मृगतृष्णा में बहुत कुछ खो दिया।’’ वे उदास स्वर में बोले। स्वाभाविक रूप से मेरे
       मुंह से प्रश्न निकला-‘‘ ऐसा क्या हो गया सुखीराम जी, बड़े उदास लग रहे हैं, आखिर
       हुआ क्या?’’ इस पर वे बोले-‘‘ गांव से मां की बीमारी की पिछले छह महीने से खबर आ रही थी, मैं कुछ रूपये उनके  के लिए भेज देता था। पर मां का यही आग्रह होता था कि एक बार मैं आकर उनसे मिल लूं। पर मैं जीवन की इस आपाधापी में ऐसा फंसा कि घर जाने का समय ही नहीं निकाल पाया। परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका थी। एक सप्ताह पहले फोन आया कि मां अब नहीं रहीं। मैं गांव पहुंचा तो सबने बताया कि मरते दम तक मां मुझे याद करती रहीें। और मुझे एक बार देखने की इच्छा लिए ही इस दुनियां से चली गईं।...’’ वे रुआसंे हो आए। सुखीराम जी पत्नी-बच्चों सहित दिल्ली में रह रहे हैं। उनके माता-पिता उत्तर-प्रदेश के एक गांव में रहते थे। सुखीराम जी एक निजी कम्पनी में र्क्लक हैं। पत्नी और बच्चों को आज की सारी सुख-सुविधाएं चाहिए। उनको जुटाने में सुखीराम जी नौकरी के अलावा अन्य ऐसे कई कार्यों में जुटे कि अपने पैतृक गांव, रिश्ते-नाते सबसे दूर होतेे चले गये। यहां तक कि अपने माता-पिता से भी कर्तव्यपूर्ति  तक का ही नाता रह गया। मैंने उन्हें सान्त्वना दी जब वे विदा हुए तो मैं सोचने लगा कि हम अपने निजी लोगों से, हमारे अपनों से दूर क्यों होते जा रहे हैं? हमारी संवेदनाएं मरती क्यों जा रही हैं। हम सड़क पर किसी बीमार या घायल को देखकर आगे क्यों बढ़ जाते हैं? किसी अपने के दुख-सुख में शामिल क्यों नही हो पाते?
सोचने पर लगा कि हम पर बाजारवाद हावी होता जा रहा है। हम सभी रिश्ते-नातों, मानवीय संवेदनाओं को लाभ-हानि की तुला पर रख कर तोलने लगे हैं। अगर हम किसी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे हैं तो सबसे पहले यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है कि इसमें हमारा क्या फायदा? अपनी लड़की की शादी में कोई सादर आमंत्रित करता है तो हम सोचते  हैं कि लड़की की शादी में कुछ देना ही पड़ेगा - यही सोचकर हम उसे टालने की कोशिश करते हैं। अपना कोई सगा-संबंधी बीमार है तो हमारे पास उसे देखने, हमदर्दी के दो शब्द बोलने का समय नहीं है।
इधर भूमण्डलीकरण के इस दौर में बाजारवाद हम पर इतना हावी हो गया है कि हम यथाशीघ्र  अधिकाधिक आधुनिकतम भौतिक सुविधाएं प्राप्त करना चाहते हैं - भले ही हमारी आर्थिक स्थिति इस लायक  न हो। दूसरी ओर बाजारवाद हमें ललचा रहा है। शाहरुख खान के रुप में बाजार चिल्ला रहा है - ‘‘ ...क्यों हो सन्तुष्ट , डोन्ट बी सन्तुष्ट। कुछ विश करो...।’’ उससे प्रभावित हम कुछ नहीं बल्कि बहुत कुंछ विश कर रहे हैं। इधर बैंक कह रहे हैं ‘ आधुनिकतम सुख-सुविधाओं का आनन्द लीजिए। क्या कहा पैसा नहीं है? फिकर नोट, हमारे पास आइए। लौन ले जाइए। वसूलना तो हम जानते हैं। मॉडर्न टेक्नोलौजी की आरामदायक वस्तुएं खरीदिए और अपने पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों पर रौब जमाइए। साथ ही अपनी टेंशन बढ़ाइए। पर मत घबराइए। टेंशन तो सिर्फ आपको होगी। वह औरों को दिखाई नहीं देगी। वैसे भी सबके पास खुद ही  अपनी-अपनी इतनी टेंशन्स हैं कि आपकी टेशन देखने की फुरसत किसे है? समय कहां है?

बच्चों के पास दादा-नाना, दादी-नानी के पास जाने बतियाने का समय नहीं हैं। उनके पास इन्टरनेट है। वीडियो गैम्स हैं। ऐसे में बूढ़े लोगों से उनके पुराने अनुभव सुनने का समय कहां है? उनके पास आउटडोर गेम खेलने का समय भी नहीे है। बेशक बचपन में ही मोटापा हावी हो जाए। बड़ो को पैसा कमाने से फुरसत कहां है? किसी से मिलने को समय कहां है? ग्लैमर्स बाजार अपनी चमक-दमक से  सबको अपनी ओर खींच रहा है। हम सम्मोहित से उसकी ओर खिंचे चले जा रहे हैं। वह इंसानियत के हर पहलू को कमोडिटी  (वस्तु) में बदल  रहा है। हम उसमें समाहित होते जा रहे हैं। मानवीय संवदेनाओं को महसूस करने, लोगों के साथ मिल बैठकर दुख-सुख बांटने, हंसने बोलने का हमारे पास समय कहां है?
संपर्क: 867 ग्राउण्ड फ्लोर, बाबा फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली-110008

            

हाशिए का हासिल

हाशिए का हासिल
-राज वाल्मीकि

 मैं रात की बची बासी रोटियां सुबह को कूड़े की बाल्टी में नहीं फेंकता। उन्हें अलग रख लेता हूं। पार्क में सुबह की सैर के लिए जाते समय उन रोटियों को साथ ले जाता हूं। कारण यह है कि पार्क में पास ही एक कूड़ाघर है। वहां कागज चुनने वाले इन्सानों से लेकर कूड़े में कुछ खाद्य ढूढते गाय एवं कुत्ते भी मौजूद होते हैं। मैं उन रोटियों को वहां फेंक देता हूं ताकि गाय या कुत्ते जो उस समय वहां उपस्थित होते हैं, खा सकें। हालांकि रोटियों को फेंकते समय दुष्यन्त कुमार की पंक्तियां मन में कौंध जाती हैं कि ‘हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत, तुमने बासी रोटियां नाहक उठाकर फेंक दीं।’ पर इससे भी बेचैन करने वाली स्थिति तब होती है जब कुत्तों का झुण्ड उन रोटियों पर टूट पड़ता है। तब डार्विन की थ्योरी याद आती है - सर्ववाईल ऑफ द फिटेस्ट’ - जो शक्तिशाली होगा वही जिएगा। रोटियों पर शक्तिशाली कुत्ते ही अपना आधिपत्य जमा लेते हैं। कभी-कभार भूले-भटके से कोई रोटी किसी पिल्ले के मुंह पड़ जाती है तो बड़े कुत्ते उस से छीन लेते हैं और पिल्ला बिचारा अपना मन मसोस कर रह जाता है।
यह दृश्य देखते हुए अनायास ही अपने यहां की सामाजिक व्यवस्था का स्मरण हो आता है। सरकारी योजनाएं याद हो आती हैं। येे योजनाएं लागू करने के लिए कम और कागजों पर खानापूर्ति के लिए अधिक होती हैं। योजनाओं के कुछ टुकड़े सरकार जरूरतमंद या लाभार्थी तक फेंकने  की कोशिश भी करती है तो उसका लॉयन शेअर दलाल हड़प जाते हैं। और बचा हुआ उस जरूरतमंद तक पहुंचा या  नहीं उसकी भी कोई गारन्टी नहीं। यदि पहुंच भी गया तो यह भी सुनिश्चित नहीं होता कि उसका उपयोग वह कर भी पाएगा या नहीं। उस पर भी झपट्टा मारने के  लिए गिद्ध दृष्टि जमाए होते हैं। मन में प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है कि देश की अधिकांश जनता  रोजी-रोटी, शिक्षा एवं आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है तो दूसरी ओर मुट्ठी भर समृद्ध वर्ग हर तरह से जिन्दगी के  मजे ले  रहा है। एक के पास इतनी राशि नहीं है कि अपने परिवार को  दो वक्त पेट भर रोटी खिला सके तो दूसरा अकूत संपत्ति  का मालिक है। क्या ये असमान वितरण व्यवस्था के कारण नहीं है?
समस्या आर्थिक ही नहीं सामाजिक भी है बल्कि कहना चाहिए कि सामाजिक पहले है। सामंतवादी एवं मनुवादी व्यवस्था ने समाज के बड़े वर्ग को हाशिए पर धकेल रखा है। उन्हें जान-बूझकर  गरीब, जर्जर व सबसे निचले पायदान पर रखा है ताकि हमेशा उनका शोषण किया जा सके। पहले तो उनसे उनके सारे आर्थिक स्रोत जैसे जमीन-जंगल छीन लिए गये। फिर उन्हें गुलाम बनाकर अपनी सेवा में लगा दिया। मनुवादी व्यवस्था ने कुछ इस तरह की उच्च-निम्न वंश क्रम परम्परा रखी ताकि आजीवन वे शोषण की चक्की में पिसते रहें। उन्हें नीच समझे जाने वाले पेशे दे दिए जिससे ये निर्धन एवं अज्ञानी लोग अपने भाग्य मे लिखा मानकर सदियों से करते आ रहे हॅैं। एक जाति विशेष के लोगों को अपना मल साफ करने का काम सौंप दिया। पितृसत्ता के कारण इस जाति के पुरूषों ने ये काम अपनी महिलाओं पर थोप दिया गया। एक इन्सान का मल दूसरा इन्सान साफ करे  यह कितना ही घृणित एवं वीभत्स  क्यों न हो, पर हमारे देश की कड़वी सच्चाई है। मृत पशुओं का चमड़ा उतारने वाले चमार हों या सूअर पालने वाले खटीक हों, समाज व्यवस्था में वे भेदभाव से ग्रसित हैं। नट, कंजर, सांसी, कलंदर, बावरिया, पांसी, बंजारे जैसी जातियां तो ऐसी हैं जो अपने ही मुल्क में खानाबदोेश हैं। उनका न कोई घर है न ठिकाना। संपरे, बन्दरों का खेल दिखाने वाले, रस्सी पर करतब दिखाने वाले, चूहे खाने वाली मुसहर जाति के लोग सब इसी देश के नागरिक हैं जिन्हें सदियों से हाशिए पर रखा गया है। इन लोगों को न तो शिक्षा की व्यवस्था है और न दो जून की रोटी के लिए कोई सम्मानित पेशे-रोजगार की। ऐसा लगता है कि ये इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।इनकी आर्थिक स्थिति जर्जर है। सामाजिक स्थिति दयनीय है। ये लोग कुछ इस तरह की जिन्दगी जी रहे हैं मानो वे इन्सान ही न हो। इनकी  कोई मानवीय गरिमा न हो। जब कि सच्चाई यह है  कि ये लोग भी इसी देश के मूलनिवासी हैं। इनका भी देश के संशाधनों पर अधिकार है। देश का संविधान इन्हें भी मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। पर शिक्षा से वंचित, दीन-हीन-गरीब इन लोगों को मनुवादी व्यवस्था ने दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर कर दिया है। इनका उत्थान परमावश्यक है।
इन लोगों को तीन चीजों की परमाश्वयकता है - वे हैं शिक्षा, रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा। ये अशिक्षित लोग न तो अपने अधिकारों को जानते हैं और न लोकतन्त्र को। दिन भर के कठिन शारीरिक परिश्रम के बाद बस किसी तरह परिवार की दो जून की रोटी नशीब हो जाए यही इनका अभीष्ट होता है। व्यवस्था द्वारा इनका अनवरत शोषण जारी है। दबंग जातियां न केवल इनसे अपनी बेगार करवाती हैं बल्कि इनका आर्थिक एवं शारीरिक शोषण भी करती हैं। देश को आजाद हुए 64 साल बीत गये पर इन्हंे क्या हासिल हुआ? ये अज्ञानी तो इसे अपनी नियति मानते हैं पर क्या इसमें सरकारी ब्यूरोक्रेट्स की नीयत बल्कि कहिए बदनीयत नहीं झलकती? प्रश्न यह भी है कि इन्हें न्याय, स्वतन्त्रता, समानता एवं मानवीय गरिमा आखिर कब हासिल होगी और कैसे?
संपर्क: 9818482899,  36/13 ग्राउण्ड फ्लोर, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली-110008

शनिवार, 23 मई 2009

samaysakshi

हाय फ्रेंड्स मेरा नाम राज वाल्मीकि है मुझे लेखन का शौक है साहित्यिक रचनाएँ पढ़ना मुझे अच्छा लगता है