सोमवार, 26 दिसंबर 2011

आधी तुम्हारी आधी हमारी

पुरूष पक्ष
आधी तुम्हारी आधी हमारी
-राज वाल्मीकि
राष्ट्रीय सहारा का  साप्ताहिक परिशिष्ट ‘आधी दुनिया’ महिलाओं का पक्ष प्रस्तुत करता है। इसमें मनीषा जी का ‘खरी-खरी’ रेगुलर कॉलम है। मुझे लगता है जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह स्त्री-पुरूष भी पूरी दुनिया के दो पहलू हैं। और ये एक दूसरे के पूरक भी हैं। आज के समय में जब हम मानव अधिकारों की बात करते हैं तो स्त्री-पुरूष के समान अधिकारों की भी बात करते हैं। प्रायः देखा गया है कि आधी दुनिया में दिए गये लेखों का निष्कर्ष यही होता है कि पुरूष स्त्रियों पर अत्याचार करते हैं। उनका यौन शोषण करते रहते हैं। लेकिन स्त्रियों को ऐसे पेश किया जाता है जैसे वे बहुत निरीह होती हैं। मासूम होती हैं। पुरूष उस पर अत्याचार करता रहता है। मनीषा जी को अक्सर यह शिकायत रहती है कि पुरूष बहुत घाघ टाइप के होते हैं। वे स्त्रियों को भोगने के लिए उन्हें फंसाते  रहते हैं। इसके लिए वे उदाहरण भी देती हैं। और अपने विचारों की पुष्टि के लिए प्रमाण भी देती हैं। जो पहलू वह देखती हैं वह सच होता है। पर जब मैं दुनिया के बारे में सोचता हूं तो अंधों और हाथी वाली कहावत याद आती है। जिसमें जो अंधा व्यक्ति हाथी के जिस अंग को पकड़ कर महसूस करता है वह हाथी का आकार उसी प्रकार का बताता है। पर आप और हम जानते हैं कि वे अपनी जगह सही होते हैं पर असल में हाथी का आकार वह नहीं होता जो वे बताते हैं। उनकी सीमा यह है कि जितना वे पकड़ कर महसूस करते हैं उसी के आधार पर बताते हैं। उसी तरह हम और आप जितनी दुनिया देखते हैं या अनुभव करते हैं उसी के आधार पर अपने विचार बनाते हैं। पूरी दुनिया के बारे में मुझे नहीं मालूम - पर अपने देश में प्रायः यह मान लिया जाता है कि यहां पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था है, और एक हद तक सच भी है। इस कारण यहां स़्ित्रयों के साथ भेदभाव किया जाता है। मनीषा जी का उद्देश्य भी यही रहता है कि लैंगिक भेदभाव समाप्त कर लैंगिक समानता स्थापित हो। इस में कोई दो राय नहीं कि वे अपनी जगह सही होती हैं। स्त्री पुरूष में समानता होनी चाहिए। दोनों के अस्तित्व के बिना यह दुनिया संभव नहीं है। उनमें स्वामी और गुलाम का रिश्ता कदापि नहीं होना चाहिए। साथी का रिश्ता होना चाहिए। बराबरी का रिश्ता होना चाहिए।
पर हम यथार्थ में देखते हैं तो आधी दुनिया परिशष्ट आधी दुनिया का आधा सच दिखाता है। पत्नी रूप में स्त्री दासी होती है,  गुलाम होती है, निरीह होती है, इस बारे में मेरा मानना है कि यह पूरा सच नहीं हैैं। मेरे पुरूष होने के कारण स्त्रियां भले इसे पुरूषवादी नजरिया कहें। पर पूरा सच सामने आना चाहिए। मैं पुरूष हूं। हम पुरूषों की भी आधी दुनिया है। जो स्त्रियों के साथ ही बीतती है। स्त्रियां चाहे मां के रूप में हों, बहन के रूप में हों या पत्नी के रूप में हों। अतः पुरूष पक्ष को इग्नोर नहीं किया जाना चाहिए।
हमारा समाज आर्थिक आधार पर कई वर्गों में बंटा हुआ है। हर वर्ग के बारे में मैं जानता हूं -ऐसा दावा नहीं कर सकता। मैं आर्थिक रूप से निम्न वर्ग से संबंधित हूं। इसलिए अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि यहां पत्नी के रूप में स्त्री मेहनत-मजदूरी करके कमाती है। पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। घर के हर फैसले में बराबर का हक रखती है। प्यार और तकरार में पुरूष से जरा भी उन्नीस नहीं है। कई बार तो घर के किसी मामलें में  पुरूष उसकी जायज और नाजायत मांग मे अपनी सहमति की मुहर इसलिए लगा देते हैं कि घर में महाभारत न हो। पुरूषों को उंगलियों पर नजाने वाली महिलाएं भी होती हैं। कहीं पुंरूषों का अहं या हठ है तो स्त्रियों का त्रिया हठ भी कम नहीं होता। महिलाओं की वजह से रामायण और महाभारत हो जाते हैं। मर्डर हो जाते हैं। इस समाज में कहीं पुरूष स्त्री का स्वामी है तो कहीं जोरू का गुलाम भी है। आज का सच यह भी है कि जिस तरह पति पीड़ित पत्नियां होती हैं उसी तरह पत्नी पीड़ित पति भी होते हैं। जहां तक अवैध  शारीरिक संबंधों की बात है तो आमतौर पर स्त्री हो या पुरूष सामाजिक मान्यताओं के भय से सभी बचते हैं। और जहां अवैध संबंध होेने की बात है तो सच यह भी है कि प्रकृति ने स्त्रियों और पुरूषों को यौनेच्छा दी है, कहीं पुरूष अवैध यौन संबंध बनाते हैं तो कहीं स्त्रियां भी पहल करती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्री-पुरूष दोनों के समान अधिकार हैं। दोनों को अपने हक लेेने चाहिए। मुझे लगता है कि हमारे देश में शिक्षित लोगों का प्रतिशत शत प्रतिशत होना चाहिए। सभी शिक्षित हों अपने और दूसरेां के अधिकारों के प्रति जागरूक हों। आज की जो शिक्षित और जागरूक स्त्रियां हैं मेरे अनुभव के अनुसार तो यही है कि कोई पुरूष बहला-फुसला कर उनसे शारीरिक संबंध नहीं बना सकता जब तक कि वे खुद न चाहें। और उनकी मरजी होती है तो एक से अधिक पुरूषों से भी इस तरह के संबंध रखती हैं। ऐसी भी स्त्रियां हमारे समाज में ही हैं। स्त्रियों के लिए ट्रेन-बसों में आरक्षित सीटें होती हैं। अस्पतालों आदि में अलग लाईने होती हैं। लड़कियों के लिए दिल्ली में  लाडली योजना है। दिल्ली मेट्रों में तो पूरा एक कंपार्टमेंट ही उनके लिए होता है। बावजूद इसके दिल्ली शहर महिलाओं के लिए सर्वाधिक असुरक्षित समझा जाता है। सरकार का  महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भी है। इसमें भी कोई दो राय नहीं की प्रतिभा के मामले में स्त्रियां पुरूषों से कहीं कम नहीं होतीं। आज हम स्त्रियों को बड़े-बड़े पदों पर आसीन देखते हैं। देश की राष्ट्रपति महिला हैं। प्रधानमंत्री भी रह चुकी हैं। मुख्यमंत्री महिलाएं हैं। क्या ये सच नहीं है? जहां तक पुरूषों के चतुर-चालाक होेने की बात है तो महिलाएं भी कम चतुर-चालाक नहीं होतीं। आर्थिक समृद्धि एवं पावर की बात लें तो आर्थिक रूप से समृद्ध महिलाओ ंके यहां पुरूषों को पानी भरते देख सकते हैं। रामू टाईप के घरेलू नौकर-ड्राईवर उनकी जीहुजूरी में लगे रहते हैं। क्या ये सच नहीं है? इसी प्रकार बड़े पदों पर आसीन महिलाएं पुरूषों को अपने इशारों पे नचाती हैं। फर्ज कीजिए कि किसी ऑफिस की बॉस महिला है। और वहां पुरूष चपरासी है तो क्या वह उसके हुक्म की उदूली नहीं करेगा? किरन वेदी जैसी प्रशासनिक अधिकारी पुलिस इंस्पेक्टर को थप्पड़ नहीं मार देतीं? ऐसी स्थिति में सिर्फ पुरूषों में ही कमियां ढूढना क्या न्यायोचित है?
मेरा मानना है कि महिलाओं पर अत्याचार, शोषण और भेदभाव होते हैं - उसके लिए उनका स्त्री होना ही कारण नहीं है। कारण इससे इतर भी हैं। हमारे देश में जातिवादी व्यवस्था होने के कारण महिला पर अत्याचार की वजह उसका दलित/आदिवासी/वंचित तबके से होना होता है। अमीरी-गरीबी की दृष्टि  से देखें तो महिलाओं के शोषण का कारण उनका गरीब होना होता है। शिक्षा के नजरिये से देखा जाए तो उनका अशिक्षित/अनपढ़ अज्ञानी होना होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि महिलाओं पर अत्याचार/शोषण/भेदभाव के कई कारण हो सकते हैं।
मुझे लगता है कि महिला सशक्तिीकरण के इस दौर में महिलाओं का उच्च शिक्षित होना परमावश्यक है। अतः हमें अपनी बहन-बेटियों को ऊंची से ऊंची शिक्षा प्रदान करवानी चाहिए। यदि महिलाएं उच्च शिक्षित होंगी। और  अच्छा रोजगार या व्यवसाय करेंगी। आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होंगीं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगी तो जाहिर है कोई उन पर अत्याचार नहीं कर पाएगा। उनके साथ भेदभाव नहीं होगा। उनका शोषण नही ंकिया जा सकेगा। तब कोई पुरूष उनका स्वामी न होगा। वे किसी की दासी न होंगीं। उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। असल में प्रकृति ने तो स्त्री पुरूष को एक दूसरे का पूरक ही बनाया है। छोटा या बड़ा नहीं। प्रकृति ने पुरूष को एक्टिव पार्टनर बनाया है। इसलिए स्त्री पुरूष की एक बड़ी कमजोरी की तरह होती है। नारीवादी लेखिकाओं से अनुरोध करना जरूरी लगता है कि कृप्या पुरूषों को स्त्रियों के दुश्मन की  तरह पेश न करें। क्योंकि उनके भी पिता-भाई-पति आदि पुरूष ही होते हैं। वे भी आपकी तरह ही इन्सान होते हैं। गलत यदि कहीं भी होता है तो निश्चित रूप से उसका विरोध किया जाना  चाहिए। पर अतिशोक्तिपूर्ण ढंग से किसी पर (स्त्री या पुरूष पर) बेवजह या बेबुनियाद आरोप या पूर्वाग्रहवश आक्षेप नहीं लगाए जाने चाहिए। इसमें दो राय नहीं है कि आखिर स्त्री और पुरूष ही तो हैं जिनसे यह दुनिया पूरी होती है। किसी एक की अनुपस्थिति में यह आधी दुुनिया हो जाती है। तो क्यों न हम मिलकर कहें कि आधी तुम्हारी आधी हमारी। आओ मिलकर कहें कि हम से ही है ये दुनिया सारी।
संपर्क: 9818482899, 36/13 ग्राउण्ड फ्लोर, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली- 110008

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें